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Sunday, May 15, 2011

कायर प्रधान मंत्री.... लादेन, आतंकवाद,नास्तिक वाद, कम्युनिज्म...दादागिरी, बुराईयाँ ख़त्म होने का दौर, जन लोकपाल, विश्व का सबसे बड़ा सत्याग्रह |

लादेन मारा गया ! विश्वास नहीं होता, पर; करना पड़ेगा। क्योकि अमेरिका कह रहा है। वैसे भी बुराई ख़त्म होने की कामना सभी करते हैं इसलिए भी हमने मान लिया। और यह समय बुराईयों के लिए ख़राब ही चल रहा है। पूरे विश्व में बुराई के विरुद्ध जनता जाग रही है। इसलिए भी हम मान लेते हैं कि लादेन मारा गया होगा। अच्छा ही हुआ बुराई को ख़त्म होना ही चाहिए।

पर जिस गोपनीयता से अमेरिकी सैनिक कार्रवाही हुयी; क्या यह संभव नहीं कि वह जिन्दा पकड़ कर ले जाया गया हो और विश्व की नजरों में धूल झोंकने के लिए अमेरिका ने कहानी बना कर पेश कर दी हो ?
कुछ समय बाद अगर अमेरिका कहे कि लादेन मरा नहीं था हमने जिन्दा पकड़ा था और उससे सभी जानकारियां लेकर अब मार रहे हैं तो ! तब भी मानना पड़ेगा, क्योकि ये सब करने के लिए अमेरिका सक्षम है। और विश्व के दो सौ देशों में से किसी की हिम्मत नहीं; कि उससे कह सके, कि हमें लादेन को दिखाओ या दिखाया क्यों नहीं या उससे यही पूछ सकें कि कोई विश्वसनीय सबूत है ? कि तुमने लादेन को मार ही दिया है। लादेन अकेला अमेरिका का ही दुश्मन नहीं था वह पूरे विश्व का दुश्मन बन गया था और विश्व के सभी देशों को यह जानने का हक़ और जिज्ञासा है कि क्या वास्तव में लादेन मारा गया ?

पूरे
विश्व से एक और बुराई का अंत पिछले कुछ वर्षों से जारी है, और वह बुराई है "नास्तिकवाद" (कम्युनिज्म)। उसका खात्मा भी यहाँ होने लगा हैहालाँकि कम्युनिज्म का जो मूल सिद्धांत है समानता का, वह कोई गलत नहीं है, पर जिस तरह वह धर्म को अफीम मानते हैं और इस विश्व को केवल भोग की वस्तु मानते हैं वह अँधेरे में भटकने जैसा ही था और वो भटक कर लुप्त होने की स्थिति में हैं।
यही सिद्धांत हमारे वेदों और बहुत से शास्त्रों में हैं जिन्हें वैदिक कम्युनिज्म या आध्यात्मिक कम्युनिज्म कहा जा सकता है इसमें मनुष्य अपनी मेहनत और ईमानदारी से कमाया हुआ धन; सेवा में, दान-पुण्य में लगा कर समाज,संस्कृति,प्रकृति की रक्षा में लगाता था; वह सनातन चला आ रहा है और अब तो उसकी महत्ता समझी जाने लगी है। और जिन नास्तिकों के द्वारा समाज को धर्म के नाम पर उलटी बातें समझा कर अँधेरे में रखा गया उनका भी खात्मे का दौर चल रहा है। जिसके लिए स्वामी रामदेवजी का विश्वव्यापी योग-आध्यात्म-और बुराईयों के विरुद्ध आन्दोलन चल रहा है
भारत में भी इन नास्तिकों की विश्वसनीयता समाप्त होने लगी है । हालाँकि अभी कोई विकल्प न होने की स्थिति में उन्हीं नास्तिकों को जनता समर्थन दे रही है; जो मुख्य धारा से अलग हुए लोग हैं, जैसे; ममता बनर्जी को .बंगाल में और कुछ औरों को और जगह । ये वैसे कोई ख़ुशी की बात नहीं है क्योकि ममता बनर्जी ईमानदार हो सकती है, सही व्यवस्थापक हो सकती है, पर ये उसी नास्तिकों के गिरोह से अलग हुयी एक सदस्य है; जिसने भारत में नास्तिकवाद के बोये बीज को जाने अनजाने पोषण दियाऔर वह है "कांग्रेस"

भारत
में नास्तिक-भोगवादी (कम्युनिज्म)विचारधारा अपनों के द्वारा उतनी सफल नहीं हो पाई जितना इस विचारधारा को कांग्रेस ने सफल बनाया। इस नास्तिक(कम्युनिष्ट) विचारधारा में घालमेल करके एक अलग विचारधाराकांग्रेसबन गयी, उसकी ही एक शाखा ये ममता बनर्जी हैं। इसलिए खुश होने की जरुरत नहीं है। ऐसा ही कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियों में हैं चाहे वो दक्षिण की हों या पूरब की। एक का असुर राज ख़त्म होता हैं दूसरे का आजाता है।

विचार धारा वही रहती है केवल चेहरे बदल जाते हैं यही वो विचारधारा है; जो भारत के महापुरुषों के नाम से बगलें झांकती है, जो भारत के मानवीय मूल्यों को तोड़-मरोड़ कर केवल बुराईयों को देखती है,यही वो विचारधारा है जो भारत के सनातन सात्विक आध्यात्मिक मूल्यों के नाम पर बिदकती है। यही वो विचारधारा है जिसे भारत की वो सांस्क्रतिक विचार धारा, ढकोसला नजर आती है जिसके द्वारा भारत एक डोर में बंधा नजर आता है इनका प्रयास उसी डोर को तोड़ने का रहा है। जातियों के नाम पर, प्रदेशों के नाम पर, सम्प्रदायों के नाम पर, समूहों के नाम पर उसी डोर को तोड़ने का प्रयास इन्होने आज तक किये हैं। इनकी साजिशों को आम आदमी नहीं समझ पाता। ये शिक्षा के क्षेत्र में,समाचारों के क्षेत्र में, समाजसेवा के क्षेत्र, में पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग सभी जगह हैं ।


इस विचार धारा वाले समाचार क्षेत्र के लोग अपनी और अपने विचार वालों की गलतियाँ छुपाने में लगे रहते हैं। इस समय प्रधान मंत्री ने जो अफगानिस्तान में बयान दिया है, वह भारत जैसे संप्रभु देश के प्रधान मंत्री को शोभा नहीं देताउन्होंने वहां बहुत ही दयनीय मुद्रा में कहा कि,अपने दुश्मनों को समाप्त करने के लिए भारत में अमेरिका जैसी हिम्मत नहीं है
ऐसी कायरता वाली बात केवल इस विचारधारा वाले लोग ही कर सकते हैं ,और इसी विचार धारा वाले लोग इसे कोई महत्व नहीं दे रहे। जब लाल बहादुर शास्त्री जी ने हुँकार भरी थी तो देश बहुत कमजोर था फिर भी उन्होंने जो जज्बा दिखाया वह अब के नेताओं में नहीं दीखता। सांप विषैला न भी हो तो अपने शत्रु को देख कर फन और फुफकार से वह उसे विचलित तो कर ही देता है। पर हमारे ये कायर प्रधान मंत्री तो अपने साथ पूरे देश को कायर समझ बैठे हैं

पर;जैसा कि हर बार होता है इस देश का जन अपनी नींद से जगता है उसे कोई जगाने वाला आता है और फिर से भारत विश्व की महाशक्ति बन जाता है। यह भी वही युग चल रहा है। समय को कोई नहीं रोक पाया, जो होना है वह होगा; इस देश की संस्कृति जाग गयी हैवह चार जून से दिल्ली के रामलीला मैदान पर दिखेगाइन नास्तिकों के होश फाख्ता हो रहे हैं कि अब कैसे मुहं छुपायें इस आन्दोलन से , सरकार परेशान है, वो सब भी परेशान हैं जिन्होंने इस आन्दोलन को दूसरे नंबर का घोषित कर दिया, उन्हें पिछले पांच वर्ष से चल रहा ये आन्दोलन नहीं दिख रहा उन्हें तो बहुत ही चतुराई से इस आन्दोलन से लोगों का ध्यान हटाने को चलाये गए जन लोकपाल बिल वाला आन्दोलन कैसे अपनी तीव्रता खोता जा
रहा है ये चिंता खाए जा रही हैं।

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